‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य: द्रौपदी का चरित्र-चित्रण
कवि: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी | monusir.com
‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में द्रौपदी केवल एक पात्र नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध उठने वाली एक बुलंद आवाज़ है। कवि ने उसे एक वीरांगना के रूप में चित्रित किया है। उसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. स्वाभिमानी और आत्मगौरव से परिपूर्ण
द्रौपदी अत्यंत स्वाभिमानी नारी है। वह भरी सभा में दुशासन द्वारा किए गए अपमान को केवल सहती नहीं, बल्कि उसे चुनौती देती है। वह स्वयं को दांव पर लगाए जाने के औचित्य पर कड़े सवाल खड़ी करती है।
2. निर्भीक और स्पष्टवादिनी
वह सभा में उपस्थित भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र जैसे दिग्गजों के सामने भी नहीं हिचकिचाती। वह स्पष्ट कहती है कि जो सभा न्याय नहीं कर सकती, वह सभा कहलाने योग्य नहीं है। उसकी निर्भीकता दुशासन जैसे अत्याचारी को भी कम्पित कर देती है।
क्या मौन रहकर भीष्म का, यह गौरव आज ढहेगा?”
3. सत्य और न्याय की प्रतिमूर्ति
द्रौपदी का अटूट विश्वास सत्य में है। उसका मानना है कि सत्य कभी पराजित नहीं हो सकता। वह अपनी शक्ति का स्रोत अपने सतीत्व और सत्य को मानती है। खण्डकाव्य का नाम ‘सत्य की जीत’ द्रौपदी के इसी अडिग विश्वास को चरितार्थ करता है।
4. तार्किक और बुद्धिमती
वह केवल विलाप नहीं करती, बल्कि तर्क देती है। उसका प्रश्न है कि यदि युधिष्ठिर स्वयं को हार चुके थे, तो उन्हें मुझे दांव पर लगाने का अधिकार कैसे था? उसके इस तर्क का उत्तर पूरी सभा में किसी के पास नहीं था।
उसके भीतर ही छिपी, प्रलय और सृष्टि है।”
5. सबला, न कि अबला
इस काव्य में द्रौपदी ‘अबला’ नहीं है। वह चीर-हरण के समय रोने-गिड़गिड़ाने के बजाय सिंहनी की तरह गरजती है। वह नारी जाति के गौरव की रक्षा के लिए अकेले ही पूरे पुरुष समाज के अहंकार से टकरा जाती है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, द्रौपदी का चरित्र नारी शक्ति के जागरण का प्रतीक है। वह अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार करना सिखाती है। ‘सत्य की जीत’ खण्डकाव्य में वह एक ऐसी तेजस्विनी नारी है, जिसकी हुंकार से अधर्म का शासन डगमगा जाता है।