सत्य की जीत:कथानक
लेखक: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
1. प्रस्तावना (Introduction)
‘सत्य की जीत’ महाभारत के ‘सभा पर्व’ की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी घटना पर आधारित है। जहाँ पारंपरिक कथाओं में चमत्कार (भगवान कृष्ण द्वारा चीर बढ़ाना) को महत्त्व दिया जाता है, वहीं माहेश्वरी जी ने इस काव्य में द्रौपदी के आत्मबल, तर्क और सत्य की शक्ति को केंद्र में रखा है। यह काव्य नारी के स्वाभिमान की उद्घोषणा है।
2. कथा का आरम्भ: द्यूत-क्रीड़ा का दुष्परिणाम
कथा का आरम्भ कुरुराज की सभा से होता है। पांडव जुए में अपना राज्य, वैभव और स्वयं को हार चुके हैं। अंत में युधिष्ठिर अपनी पत्नी द्रौपदी को भी दांव पर लगा देते हैं और हार जाते हैं। दुर्योधन अपनी पुरानी ईर्ष्या का बदला लेने के लिए द्रौपदी को अपमानित करने का निश्चय करता है।
दुःशासन का क्रूर कृत्य:दुर्योधन के आदेश पर दुःशासन द्रौपदी के कक्ष में जाता है। वह ऋतुमती और एकवस्त्रा द्रौपदी को अपमानित करते हुए उसके बाल पकड़कर राजसभा में घसीट लाता है। पूरी सभा मूकदर्शक बनी रहती है।
3. द्रौपदी का प्रखर प्रतिकार और तर्क
राजसभा में पहुँचकर द्रौपदी असहाय होकर विलाप नहीं करती, बल्कि एक वीरांगना की तरह गरजती है। वह सभा में उपस्थित धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण और विदुर से धर्म और नीति पर प्रश्न करती है।
“जो व्यक्ति स्वयं को हार चुका है, क्या उसे किसी अन्य (पत्नी) को दांव पर लगाने का कानूनी या नैतिक अधिकार है?”
उसके इन तर्कों के सामने भीष्म जैसे महारथी भी निरुत्तर हो जाते हैं। द्रौपदी स्पष्ट करती है कि वह ‘दासी’ नहीं है क्योंकि युधिष्ठिर का उसे दांव पर लगाना अवैध था।
4. चीर-हरण का प्रयास और सत्य की शक्ति
जब तर्क काम नहीं आते, तो दुर्योधन के उकसाने पर दुःशासन द्रौपदी की साड़ी खींचने का प्रयास करता है। यहाँ कवि ने दिखाया है कि द्रौपदी किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं करती, बल्कि अपनी सत्यनिष्ठा और पातिव्रत धर्म की शक्ति को जागृत करती है।
वह चुनौती देती है कि यदि वह सत्य पर है, तो अधर्म उसे छू भी नहीं सकता। दुःशासन साड़ी खींचते-खींचते थक जाता है, सभा में कपड़ों का अंबार लग जाता है, लेकिन वह द्रौपदी के सतीत्व को भंग नहीं कर पाता। यह दृश्य अधर्म पर धर्म की नैतिक विजय को दर्शाता है।
5. उपसंहार: सत्य की विजय
अंत में, द्रौपदी के तेज और उसके तर्कों से पूरी सभा प्रभावित होती है। दुःशासन लज्जित होकर बैठ जाता है। धृतराष्ट्र को अपनी और अपने पुत्रों की भूल का आभास होता है। वे पांडवों को उनके अस्त्र-शस्त्र और राज्य लौटाकर उन्हें मुक्त कर देते हैं।
कथा का समापन सत्य की जय-जयकार के साथ होता है, जहाँ सिद्ध होता है कि शस्त्र बल के सामने आत्मबल हमेशा विजयी रहता है।