UPBOARD CLASS 10TH:Q5 अपने पठित खण्ड काव्य के आधार पर निम्न लिखित में से किसी एक का उत्तर दीजिए:

मुक्ति-दूत: गांधी जी का चरित्र-चित्रण

‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य: महात्मा गाँधी का चरित्र-चित्रण

डॉ. राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य के नायक महात्मा गाँधी हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. दिव्य पुरुष और ईश्वरीय अवतार

कवि ने गाँधी जी को एक दिव्य पुरुष के रूप में चित्रित किया है, जिन्होंने भारत की सुप्त चेतना को जगाने के लिए अवतार लिया।

“जब-जब बढ़ता पाप धरा पर, तब-तब आते देव महान,
भारत की सुप्त चेतना जगाने, आए गाँधी बन भगवान।”

2. सत्य और अहिंसा के पुजारी

गाँधी जी ने सत्य और अहिंसा को अपना अस्त्र बनाया और अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी।

3. मानवता के रक्षक

उन्होंने समाज से छुआछूत मिटाने के लिए दलितों को ‘हरिजन’ नाम दिया और समता का संदेश फैलाया।

“छुआछूत की रूढ़ि मिटाकर, समता का संचार किया,
दीन-दुखियों को गले लगाकर, जग का बेड़ा पार किया।”

4. दृढ़ निश्चयी नायक

कठिन से कठिन परिस्थितियों और जेल की यातनाओं के बाद भी वे अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं हुए।

निष्कर्ष

गाँधी जी एक युग-पुरुष थे जिनका त्याग और करुणा आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

मुक्ति-दूत: चतुर्थ सर्ग कथानक

मुक्ति-दूत: चतुर्थ सर्ग (कथानक)

डॉ. राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित ‘मुक्ति-दूत’ खण्डकाव्य का यह सर्ग महात्मा गांधी के सामाजिक सुधारों और अस्पृश्यता निवारण पर केंद्रित है।

सामाजिक चेतना का उदय

गांधी जी का मानना था कि स्वराज्य केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं, बल्कि समाज के भीतर फैली ऊंच-नीच की भावना से मुक्ति है। उन्होंने समाज को चेतावनी दी कि यदि हम अपनों को अछूत मानेंगे, तो स्वाधीनता का कोई मूल्य नहीं रहेगा।

“छुआछूत का कलंक मिटाना, मेरा प्रथम धर्म है भाई,
मानवता की रक्षा करना, सच्ची देश-भक्ति कहलाई।”

हरिजनोद्धार का संकल्प

गांधी जी ने दलितों को ‘हरिजन’ (ईश्वर की संतान) का सम्मानजनक नाम दिया। उन्होंने स्वयं सफाई अभियान चलाकर यह संदेश दिया कि कोई भी कार्य छोटा नहीं होता। उन्होंने रचनात्मक कार्यों जैसे खादी और चरखे के माध्यम से जनता को आत्मनिर्भर बनाया।

माता के संस्कारों का प्रभाव

गांधी जी के जीवन पर उनकी माता पुतलीबाई के धार्मिक विचारों का गहरा प्रभाव था। माता की दी हुई सीख कि “दीन-दुखियों की सेवा ही परमो धर्म है”, उनके पूरे जीवन का आधार बनी।

“सत्य और अहिंसा के बल पर, नव-युग का निर्माण किया,
दीन-दलित को गले लगाकर, मानवता का सम्मान किया।”

निष्कर्ष

चतुर्थ सर्ग हमें सिखाता है कि मानसिक और सामाजिक गुलामी से मुक्ति पाना ही वास्तविक स्वतंत्रता की पहली सीढ़ी है। गांधी जी ने दलित वर्ग को मुख्यधारा में जोड़कर राष्ट्र को संगठित किया।

ज्योति जवाहर: नेहरू जी का चरित्र-चित्रण

‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य: जवाहरलाल नेहरू का चरित्र-चित्रण

देवीप्रसाद शुक्ल ‘राही’ कृत ‘ज्योति जवाहर’ खण्डकाव्य के नायक पण्डित जवाहरलाल नेहरू हैं। कवि ने उनके व्यक्तित्व को भारतीय संस्कृति के समन्वयकारी रूप में प्रस्तुत किया है।

1. अलौकिक एवं दिव्य पुरुष

नेहरू जी का व्यक्तित्व महान विभूतियों का संगम है। उनमें गांधी जी की करुणा, बुद्ध की शांति और महाराणा प्रताप का साहस एक साथ दिखाई देता है।

“जवाहरलाल भारत के, अनुपम गौरव के प्रतीक,
जिनके चरणों में नत मस्तक, दुनिया की हर रीति-नीति।”

2. शांति के अग्रदूत

नेहरू जी विश्वबंधुत्व के प्रबल समर्थक थे। ‘पंचशील’ सिद्धांतों के माध्यम से उन्होंने दुनिया को युद्ध के बजाय सह-अस्तित्व और शांति का संदेश दिया।

3. महान देशभक्त और जन-नायक

देश की आजादी के लिए उन्होंने अपना ऐश्वर्य त्याग दिया। वे जनता के चहेते ‘चाचा नेहरू’ थे, जिनके हृदय में भारत की मिट्टी के प्रति अटूट प्रेम था।

“भारत की माटी का कण-कण, उनका करता है गुणगान,
वे युग-निर्माता, पथ-प्रदर्शक, भारत के गौरव महान।”

4. दृढ़ निश्चयी एवं राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार

उन्होंने ‘विविधता में एकता’ को भारत की शक्ति बनाया। कश्मीर से कन्याकुमारी तक वे पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाले महान राजनेता थे।

निष्कर्ष

संक्षेप में, नेहरू जी एक युग-दृष्टा और मानवता के सच्चे सेवक थे। उनका विराट व्यक्तित्व आज भी राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।

मेवाड़-मुकुट: द्वितीय सर्ग ‘लक्ष्मी’

‘मेवाड़-मुकुट’ : द्वितीय सर्ग (लक्ष्मी) का सारांश

गंगा रत्न पाण्डेय द्वारा रचित ‘मेवाड़-मुकुट’ खण्डकाव्य महाराणा प्रताप के संघर्ष की गाथा है। इसका द्वितीय सर्ग प्रताप की पत्नी रानी लक्ष्मी के त्याग और धैर्य को समर्पित है।

अरावली का संघर्ष

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद प्रताप अपने परिवार सहित अरावली के जंगलों में शरण लिए हुए हैं। महलों की राजलक्ष्मी आज वनों की धूल और अभावों में जीवन बिता रही हैं, लेकिन उनका स्वाभिमान अडिग है।

“महलों की वह राजलक्ष्मी, आज वन-वन भटक रही है,
किन्तु स्वाभिमान की खातिर, कष्टों को हँसकर सह रही है।”

एक माँ और वीरांगना का द्वंद्व

लक्ष्मी का हृदय अपने सुकुमार पुत्र के कष्टों और भूख को देखकर द्रवित हो उठता है। एक माँ के रूप में वे दुखी हैं, परंतु महाराणा प्रताप की पत्नी होने के नाते वे पराधीनता के विचार को भी मन में नहीं आने देतीं। वे प्रताप के स्वतंत्रता के महायज्ञ में उनकी शक्ति बनकर खड़ी हैं।

“स्वतंत्रता की वेदी पर, जिसने सर्वस्व लुटाया है,
उस नारी के पावन तप ने, मेवाड़ का मान बढ़ाया है।”

निष्कर्ष

यह सर्ग भारतीय नारी के उस मौन त्याग का प्रतीक है, जो इतिहास के पन्नों में योद्धाओं की तलवारों के पीछे अक्सर छिप जाता है। लक्ष्मी का चरित्र धैर्य और देशभक्ति का अनुपम उदाहरण है।

मेवाड़-मुकुट एवं अग्रपूजा नोट्स

‘मेवाड़-मुकुट’: दौलत का चरित्र-चित्रण

गंगा रत्न पाण्डेय द्वारा रचित इस खण्डकाव्य में दौलत एक प्रेरणादायक पात्र है। वह अकबर के सेनापति की पुत्री होकर भी मानवता का पक्ष चुनती है।

1. सरल और निष्कपट स्वभाव

दौलत राजनीति के षड्यंत्रों से दूर है। वह शत्रुपक्ष की होने के बावजूद राणा प्रताप के महान चरित्र के प्रति गहरी श्रद्धा रखती है।

2. साम्प्रदायिक एकता की मिसाल

वह मुस्लिम होकर भी हिंदू रक्षक राणा प्रताप को पिता तुल्य मानती है। उसका पात्र यह सिद्ध करता है कि धर्म से ऊपर मानवता का स्थान है।

“महलों की झूठी चकाचौंध से, उसको न जरा भी प्यार था,
राणा के पावन चरणों में, उसका सारा संसार था।”

‘अग्रपूजा’: खण्डकाव्य की कथावस्तु

पण्डित रामबहोरी शुक्ल कृत ‘अग्रपूजा’ महाभारत की ‘राजसूय यज्ञ’ की घटना पर आधारित एक गौरवशाली काव्य है।

प्रमुख घटनाक्रम

  • राजसूय यज्ञ का संकल्प: इन्द्रप्रस्थ की स्थापना के बाद युधिष्ठिर चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए यज्ञ का आयोजन करते हैं।
  • अग्रपूजा का विवाद: भीष्म पितामह के सुझाव पर श्रीकृष्ण की प्रथम पूजा की जाती है, जिसका शिशुपाल विरोध करता है।
  • शिशुपाल वध: बार-बार अपमान करने पर श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का अंत करते हैं और यज्ञ शांतिपूर्वक संपन्न होता है।
“श्रीकृष्ण ही सर्वेश्वर हैं, इस जग के पालनहार हैं,
अग्रपूजा के एकमात्र, वे ही सच्चे अधिकार हैं।”

‘अग्रपूजा’ के नायक: युधिष्ठिर का चरित्र-चित्रण

1. धर्मपरायण: युधिष्ठिर सत्य और धर्म के साक्षात् प्रतीक हैं, जिन्हें ‘धर्मराज’ के नाम से जाना जाता है।

2. विनम्र स्वभाव: वे अत्यंत शीलवान और विनम्र हैं, उनके मन में बड़ों के प्रति अपार आदर है।

3. कृष्ण भक्त: वे श्रीकृष्ण को अपना मार्गदर्शक मानते हैं और उन्हीं की इच्छा को सर्वोपरि रखते हैं।

4. आदर्श शासक: इन्द्रप्रस्थ की प्रजा उनके न्यायप्रिय शासन में पूर्णतः सुखी थी।

जय सुभाष: प्रथम सर्ग सारांश

‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य: प्रथम सर्ग (कथानक)

माथुर प्रसाद ‘माथुर’ कृत ‘जय सुभाष’ खण्डकाव्य का प्रथम सर्ग नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म और बाल्यकाल की प्रेरक घटनाओं पर आधारित है।

जन्म और वंश परिचय

सुभाष चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक नगर में हुआ था। उनके पिता जानकीनाथ बोस और माता प्रभावती देवी के धार्मिक और अनुशासित संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को महान बनाया।

“कटक नगर की पावन धरती, धन्य हुई वह महान घड़ी,
जब भारत के इस वीर रत्न की, पहली किलकारी वहाँ पड़ी।”

देशभक्ति का उदय

बचपन से ही सुभाष के मन में गरीबों के प्रति करुणा और अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना थी। उन्होंने छोटी उम्र में ही समाज में व्याप्त भेदभाव और विदेशी शासन की क्रूरता को पहचान लिया था, जिसने उनके भीतर क्रांति की लौ जलाई।

“बचपन से ही जिनके नैनों में, आजादी का सपना था,
भारत माता की सेवा ही, जिनका धर्म बस अपना था।”

निष्कर्ष

यह सर्ग हमें बताता है कि किस प्रकार कटक के सुसंस्कृत वातावरण और माता-पिता के संस्कारों ने भारत को उसका ‘नेताजी’ दिया।

मातृभूमि के लिए: संकल्प सर्ग, चरित्र-चित्रण एवं महत्वपूर्ण प्रश्न | monusir.com

‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य: सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री

UP Board परीक्षा 2026 विशेष – monusir.com

प्रश्न 1: ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग ‘संकल्प’ का सारांश लिखिए।

प्रथम सर्ग: ‘संकल्प’ का सारांश

डॉ. जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य भारतीय क्रांति के महानायक चन्द्रशेखर आजाद के जीवन पर आधारित है। इसका प्रथम सर्ग ‘संकल्प’ उनके बचपन और क्रांतिकारी विचारों के उदय का वर्णन करता है।

आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के भाबरा गाँव में हुआ था। बचपन से ही उनका मन साहसिक कार्यों में अधिक रमता था। 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने उनके कोमल मन पर गहरा आघात किया, जिससे उनके भीतर प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी।

[attachment_0](attachment)
“जलियाँवाला बाग का दृश्य, जब आँखों के सम्मुख आया,
प्रतिशोध की ज्वाला ने तब, उनके तन-मन को दहलाया।”

मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्हें गिरफ्तार किया गया। अदालत में उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और पता ‘जेलखाना’ बताया। 15 कोड़ों की अमानवीय सजा के दौरान ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष करते हुए उन्होंने संकल्प लिया कि वे कभी जीवित गिरफ्तार नहीं होंगे।

प्रश्न 2: ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र-चित्रण कीजिए।

नायक चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र-चित्रण

आजाद इस खण्डकाव्य के नायक और राष्ट्रभक्ति के साक्षात् अवतार हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं:

1. अनन्य राष्ट्रभक्ति

आजाद के लिए मातृभूमि से बढ़कर कुछ नहीं था। उन्होंने अपनी किशोरावस्था से लेकर अंतिम सांस तक देश की आजादी के लिए संघर्ष किया।

“मातृभूमि की बलिवेदी पर, जिसने अपना शीश चढ़ाया,
अमर शहीद वह वीर पुरुष, भारत का गौरव कहलाया।”

2. अदम्य साहस और निर्भीकता

आजाद का साहस अद्वितीय था। अंग्रेजों की पूरी फौज उनके नाम से भयभीत रहती थी। उन्होंने काकोरी कांड और साण्डर्स वध जैसी घटनाओं का निर्भीकता से नेतृत्व किया।

3. अपनी प्रतिज्ञा के प्रति अटल

आजाद ने कसम खाई थी कि वे कभी जिंदा नहीं पकड़े जाएंगे। 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में अकेले लड़ते हुए जब अंतिम गोली बची, तो उन्होंने स्वयं को बलिदान कर दिया लेकिन अपनी प्रतिज्ञा नहीं टूटने दी।

“पकड़ न पाई गोरों की फौज, वह वीर सदा ही रहा आजाद।”
प्रश्न 3: ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के ‘बलिदान’ सर्ग की प्रमुख घटना क्या है?

तृतीय सर्ग: ‘बलिदान’ की घटना

इस सर्ग में आजाद के अंतिम बलिदान का चित्रण है। प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस से घिर जाने पर आजाद ने एक वीर योद्धा की तरह मुकाबला किया।

“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।”

अंतिम गोली स्वयं को मारकर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे वास्तव में ‘आजाद’ थे।

कर्ण खण्डकाव्य: द्रौपदी सर्ग सारांश एवं श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण | monusir.com

‘कर्ण’ खण्डकाव्य: महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री

कवि: केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ | monusir.com

प्रश्न 1: ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘द्रौपदी’ सर्ग का सारांश लिखिए।

द्रौपदी सर्ग: कथानक का सारांश

केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित ‘कर्ण’ खण्डकाव्य में ‘द्रौपदी’ सर्ग अत्यंत हृदयस्पर्शी है। यह सर्ग द्यूत सभा में पांडवों की हार और द्रौपदी के अपमान की घटना पर केंद्रित है।

जब महाराज युधिष्ठिर जुए में सब कुछ हारने के बाद द्रौपदी को भी दांव पर लगा देते हैं, तब दुर्योधन के आदेश पर दुशासन द्रौपदी को अपमानित करते हुए सभा में लाता है। द्रौपदी वहाँ उपस्थित भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र जैसे विद्वानों से अपने अधिकारों और न्याय पर प्रश्न करती है, किंतु सब मौन रह जाते हैं।

“नारी का अपमान जहाँ, वह सभा नहीं श्मशान है,
मौन रहे जो न्याय देख, वह पत्थर के समान है।”

जब दुशासन द्रौपदी का चीर-हरण करने का प्रयास करता है, तब द्रौपदी श्रीकृष्ण का स्मरण करती है। अंततः दैवीय चमत्कार से द्रौपदी की लाज बचती है। यह सर्ग समाज में स्त्री के स्वाभिमान और न्याय की व्यवस्था पर कड़े प्रहार करता है।


प्रश्न 2: ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।

श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण

खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण एक युगदृष्टा, नीति-कुशल और धर्म-रक्षक के रूप में चित्रित हैं। उनके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. नीति-निपुण राजनीतिज्ञ

श्रीकृष्ण एक चतुर राजनीतिज्ञ हैं जो युद्ध टालने के लिए संधि का प्रस्ताव लेकर जाते हैं, किंतु अधर्म का पक्ष लेने वालों को सबक सिखाने की रणनीति भी जानते हैं।

2. शांति के अग्रदूत

वे कुरुक्षेत्र के विनाश को रोकने के लिए कौरवों की सभा में शांतिदूत बनकर जाते हैं और केवल पाँच गाँवों की मांग करते हैं, जो उनकी न्यायप्रियता का प्रमाण है।

“दो न्याय अगर तो आधा दो, पर इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम।”

3. मानवता के रक्षक

द्रौपदी की रक्षा करना हो या अर्जुन के मोह का निवारण, श्रीकृष्ण सदैव मानवता और धर्म के पक्ष में खड़े रहते हैं। वे कर्ण के गुणों का भी सम्मान करते हैं और उसे सत्य से परिचित कराते हैं।

निष्कर्ष

संक्षेप में, श्रीकृष्ण इस काव्य के सूत्रधार हैं जिनका उद्देश्य समाज से अन्याय का अंत कर धर्म का साम्राज्य स्थापित करना है।

तुमुल खण्डकाव्य: लक्ष्मण चरित्र-चित्रण एवं सर्गों का सारांश | monusir.com

‘तुमुल’ खण्डकाव्य: सम्पूर्ण अध्ययन गाइड (UP Board 2026)

कवि: श्याम नारायण पाण्डेय | monusir.com विशेष

प्रश्न 1: ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण कीजिए।

लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण

श्याम नारायण पाण्डेय द्वारा रचित ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में लक्ष्मण एक आदर्श भाई और अपराजेय योद्धा के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं:

1. अनन्य भ्रातृ-भक्ति

लक्ष्मण का सम्पूर्ण जीवन श्री राम की सेवा के लिए समर्पित है। वे राम को अपना आराध्य मानते हैं और उनकी छाया बनकर उनके साथ रहते हैं।

2. अदम्य साहस और शौर्य

वे एक वीर योद्धा हैं। मेघनाद जैसे मायावी और शक्तिशाली राक्षस का वध करना उनकी अजेय शक्ति का प्रमाण है। युद्ध भूमि में वे साक्षात् काल के समान प्रतीत होते हैं।

“चला रहे थे बाण प्रलय के, सौमित्र वीर रणधीर जहाँ,
काँप रहा था काल स्वयं भी, देख धनुष की तान वहाँ।”

3. मर्यादा और अनुशासन

क्रोधी स्वभाव के होने के उपरान्त भी लक्ष्मण श्री राम की आज्ञा का सदैव पालन करते हैं। वे एक अनुशासित अनुज और धर्म-रक्षक योद्धा हैं।


प्रश्न 2: ‘राम मिलन’ और ‘सौमित्र का उपचार’ सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।

राम मिलन एवं सौमित्र का उपचार: कथावस्तु

1. राम मिलन: भ्रातृ-प्रेम का मार्मिक दृश्य

मेघनाद की ‘शक्ति’ लगने से लक्ष्मण मूर्च्छित हो जाते हैं। हनुमान उन्हें रणभूमि से उठाकर श्री राम के पास लाते हैं। लक्ष्मण की यह दशा देखकर राम एक सामान्य मनुष्य की भाँति विलाप करने लगते हैं। यह सर्ग राम के मानवीय दुःख और लक्ष्मण के प्रति उनके अगाध प्रेम को प्रदर्शित करता है।

“जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।”

2. सौमित्र का उपचार: हनुमान का पराक्रम

लक्ष्मण के उपचार हेतु हनुमान लंका से सुषेण वैद्य को लेकर आते हैं। सुषेण वैद्य हिमालय से संजीवनी बूटी लाने का परामर्श देते हैं। हनुमान पवन-वेग से उड़कर द्रोणागिरी पर्वत पर पहुँचते हैं, और औषधि की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उठा लाते हैं।

सुषेण वैद्य द्वारा औषधि का प्रयोग करते ही लक्ष्मण की मूर्च्छा भंग हो जाती है और वे पुनः स्वस्थ होकर खड़े हो जाते हैं। पूरी वानर सेना में हर्ष व्याप्त हो जाता है और राम अपने अनुज को गले लगा लेते हैं।

“संजीवनी का पान कर, जागे वीर सौमित्र महान,
राम हृदय से लगा लिया, जैसे मिल गए हों निज प्राण।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *