प्रश्न 1: ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के प्रथम सर्ग ‘संकल्प’ का सारांश लिखिए।
प्रथम सर्ग: ‘संकल्प’ का सारांश
डॉ. जयशंकर त्रिपाठी द्वारा रचित ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य भारतीय क्रांति के महानायक चन्द्रशेखर आजाद के जीवन पर आधारित है। इसका प्रथम सर्ग ‘संकल्प’ उनके बचपन और क्रांतिकारी विचारों के उदय का वर्णन करता है।
आजाद का जन्म मध्य प्रदेश के भाबरा गाँव में हुआ था। बचपन से ही उनका मन साहसिक कार्यों में अधिक रमता था। 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने उनके कोमल मन पर गहरा आघात किया, जिससे उनके भीतर प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी।
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“जलियाँवाला बाग का दृश्य, जब आँखों के सम्मुख आया,
प्रतिशोध की ज्वाला ने तब, उनके तन-मन को दहलाया।”
मात्र 15 वर्ष की आयु में उन्हें गिरफ्तार किया गया। अदालत में उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और पता ‘जेलखाना’ बताया। 15 कोड़ों की अमानवीय सजा के दौरान ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष करते हुए उन्होंने संकल्प लिया कि वे कभी जीवित गिरफ्तार नहीं होंगे।
प्रश्न 2: ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के आधार पर चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र-चित्रण कीजिए।
नायक चन्द्रशेखर आजाद का चरित्र-चित्रण
आजाद इस खण्डकाव्य के नायक और राष्ट्रभक्ति के साक्षात् अवतार हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं:
1. अनन्य राष्ट्रभक्ति
आजाद के लिए मातृभूमि से बढ़कर कुछ नहीं था। उन्होंने अपनी किशोरावस्था से लेकर अंतिम सांस तक देश की आजादी के लिए संघर्ष किया।
“मातृभूमि की बलिवेदी पर, जिसने अपना शीश चढ़ाया,
अमर शहीद वह वीर पुरुष, भारत का गौरव कहलाया।”
2. अदम्य साहस और निर्भीकता
आजाद का साहस अद्वितीय था। अंग्रेजों की पूरी फौज उनके नाम से भयभीत रहती थी। उन्होंने काकोरी कांड और साण्डर्स वध जैसी घटनाओं का निर्भीकता से नेतृत्व किया।
3. अपनी प्रतिज्ञा के प्रति अटल
आजाद ने कसम खाई थी कि वे कभी जिंदा नहीं पकड़े जाएंगे। 27 फरवरी 1931 को अल्फ्रेड पार्क में अकेले लड़ते हुए जब अंतिम गोली बची, तो उन्होंने स्वयं को बलिदान कर दिया लेकिन अपनी प्रतिज्ञा नहीं टूटने दी।
“पकड़ न पाई गोरों की फौज, वह वीर सदा ही रहा आजाद।”
प्रश्न 3: ‘मातृभूमि के लिए’ खण्डकाव्य के ‘बलिदान’ सर्ग की प्रमुख घटना क्या है?
तृतीय सर्ग: ‘बलिदान’ की घटना
इस सर्ग में आजाद के अंतिम बलिदान का चित्रण है। प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस से घिर जाने पर आजाद ने एक वीर योद्धा की तरह मुकाबला किया।
“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।”
अंतिम गोली स्वयं को मारकर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे वास्तव में ‘आजाद’ थे।
प्रश्न 1: ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर ‘द्रौपदी’ सर्ग का सारांश लिखिए।
द्रौपदी सर्ग: कथानक का सारांश
केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ द्वारा रचित ‘कर्ण’ खण्डकाव्य में ‘द्रौपदी’ सर्ग अत्यंत हृदयस्पर्शी है। यह सर्ग द्यूत सभा में पांडवों की हार और द्रौपदी के अपमान की घटना पर केंद्रित है।
जब महाराज युधिष्ठिर जुए में सब कुछ हारने के बाद द्रौपदी को भी दांव पर लगा देते हैं, तब दुर्योधन के आदेश पर दुशासन द्रौपदी को अपमानित करते हुए सभा में लाता है। द्रौपदी वहाँ उपस्थित भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र जैसे विद्वानों से अपने अधिकारों और न्याय पर प्रश्न करती है, किंतु सब मौन रह जाते हैं।
“नारी का अपमान जहाँ, वह सभा नहीं श्मशान है,
मौन रहे जो न्याय देख, वह पत्थर के समान है।”
जब दुशासन द्रौपदी का चीर-हरण करने का प्रयास करता है, तब द्रौपदी श्रीकृष्ण का स्मरण करती है। अंततः दैवीय चमत्कार से द्रौपदी की लाज बचती है। यह सर्ग समाज में स्त्री के स्वाभिमान और न्याय की व्यवस्था पर कड़े प्रहार करता है।
प्रश्न 2: ‘कर्ण’ खण्डकाव्य के आधार पर श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
श्रीकृष्ण का चरित्र-चित्रण
खण्डकाव्य में श्रीकृष्ण एक युगदृष्टा, नीति-कुशल और धर्म-रक्षक के रूप में चित्रित हैं। उनके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. नीति-निपुण राजनीतिज्ञ
श्रीकृष्ण एक चतुर राजनीतिज्ञ हैं जो युद्ध टालने के लिए संधि का प्रस्ताव लेकर जाते हैं, किंतु अधर्म का पक्ष लेने वालों को सबक सिखाने की रणनीति भी जानते हैं।
2. शांति के अग्रदूत
वे कुरुक्षेत्र के विनाश को रोकने के लिए कौरवों की सभा में शांतिदूत बनकर जाते हैं और केवल पाँच गाँवों की मांग करते हैं, जो उनकी न्यायप्रियता का प्रमाण है।
“दो न्याय अगर तो आधा दो, पर इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रक्खो अपनी धरती तमाम।”
3. मानवता के रक्षक
द्रौपदी की रक्षा करना हो या अर्जुन के मोह का निवारण, श्रीकृष्ण सदैव मानवता और धर्म के पक्ष में खड़े रहते हैं। वे कर्ण के गुणों का भी सम्मान करते हैं और उसे सत्य से परिचित कराते हैं।
निष्कर्ष
संक्षेप में, श्रीकृष्ण इस काव्य के सूत्रधार हैं जिनका उद्देश्य समाज से अन्याय का अंत कर धर्म का साम्राज्य स्थापित करना है।
तुमुल खण्डकाव्य: लक्ष्मण चरित्र-चित्रण एवं सर्गों का सारांश | monusir.com
प्रश्न 1: ‘तुमुल’ खण्डकाव्य के आधार पर लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण कीजिए।
लक्ष्मण का चरित्र-चित्रण
श्याम नारायण पाण्डेय द्वारा रचित ‘तुमुल’ खण्डकाव्य में लक्ष्मण एक आदर्श भाई और अपराजेय योद्धा के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं:
1. अनन्य भ्रातृ-भक्ति
लक्ष्मण का सम्पूर्ण जीवन श्री राम की सेवा के लिए समर्पित है। वे राम को अपना आराध्य मानते हैं और उनकी छाया बनकर उनके साथ रहते हैं।
2. अदम्य साहस और शौर्य
वे एक वीर योद्धा हैं। मेघनाद जैसे मायावी और शक्तिशाली राक्षस का वध करना उनकी अजेय शक्ति का प्रमाण है। युद्ध भूमि में वे साक्षात् काल के समान प्रतीत होते हैं।
“चला रहे थे बाण प्रलय के, सौमित्र वीर रणधीर जहाँ,
काँप रहा था काल स्वयं भी, देख धनुष की तान वहाँ।”
3. मर्यादा और अनुशासन
क्रोधी स्वभाव के होने के उपरान्त भी लक्ष्मण श्री राम की आज्ञा का सदैव पालन करते हैं। वे एक अनुशासित अनुज और धर्म-रक्षक योद्धा हैं।
प्रश्न 2: ‘राम मिलन’ और ‘सौमित्र का उपचार’ सर्ग की कथावस्तु संक्षेप में लिखिए।
राम मिलन एवं सौमित्र का उपचार: कथावस्तु
1. राम मिलन: भ्रातृ-प्रेम का मार्मिक दृश्य
मेघनाद की ‘शक्ति’ लगने से लक्ष्मण मूर्च्छित हो जाते हैं। हनुमान उन्हें रणभूमि से उठाकर श्री राम के पास लाते हैं। लक्ष्मण की यह दशा देखकर राम एक सामान्य मनुष्य की भाँति विलाप करने लगते हैं। यह सर्ग राम के मानवीय दुःख और लक्ष्मण के प्रति उनके अगाध प्रेम को प्रदर्शित करता है।
“जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।”
2. सौमित्र का उपचार: हनुमान का पराक्रम
लक्ष्मण के उपचार हेतु हनुमान लंका से सुषेण वैद्य को लेकर आते हैं। सुषेण वैद्य हिमालय से संजीवनी बूटी लाने का परामर्श देते हैं। हनुमान पवन-वेग से उड़कर द्रोणागिरी पर्वत पर पहुँचते हैं, और औषधि की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उठा लाते हैं।
सुषेण वैद्य द्वारा औषधि का प्रयोग करते ही लक्ष्मण की मूर्च्छा भंग हो जाती है और वे पुनः स्वस्थ होकर खड़े हो जाते हैं। पूरी वानर सेना में हर्ष व्याप्त हो जाता है और राम अपने अनुज को गले लगा लेते हैं।
“संजीवनी का पान कर, जागे वीर सौमित्र महान,
राम हृदय से लगा लिया, जैसे मिल गए हों निज प्राण।”